ओकिनावा की उम्मीद: दीर्घ आयु के जीते‑जागते क़िस्से

जब मैं पहली बार जापान के सबसे दक्षिणी द्वीप समूह, ओकिनावा पहुँचा, तो समुद्र की नीली चादर और हवा में तैरती नम खुशबू ने मेरा स्वागत किया। लेकिन असली चमत्कार वहाँ के लोग थे—वो बुज़ुर्ग जो उम्र के अंक को मानो खेल समझते हैं।


ओगिमी गाँव की पत्थर‑लिखित सीख

सफ़र की शुरुआत ओगिमी से हुई, जिसे “सेंटेनरी विलेज” कहा जाता है। गाँव के प्रवेश पर एक शिला है जिस पर लिखा है—
“अगर आप 80 के हैं, तो अब भी जवान हैं। 90 के बाद पूर्वज बुलाएँ, तो कहना—सौ पूरा होने के बाद बात करेंगे।”

यहाँ यह कोई मज़ाक नहीं; सचमुच 100 पार लोग गली‑गली मिल जाते हैं। मैंने सोचा—इन लोगों के चेहरे पर ऐसी चमक और आँखों में ऐसा सुकून आख़िर आता कहाँ से है?


78 साल की टैक्सी ड्राइवर शीमा

एयरपोर्ट से शहर तक की टैक्सी शीमा‑सान चला रही थीं। हाथ मज़बूत, आँखों पर न चश्मा, न झुर्रियों में ढिलापन। रास्ते भर वह मुस्कुराकर बताती रहीं कि उनका “लंच बॉक्स सलाद” कभी नहीं छूटता—हर दिन हरे पत्ते, समुद्री साग और हल्दी का हल्का अचार।

ननकुरुनाइसा,” उन्होंने कहा, “मतलब—सब ठीक हो जाएगा। जो होना है, उसे सहजता से अपनाओ।” यह उनका जीवन‑मंत्र है। उन्होंने मुझसे किराया लेने से पहले पूछा, “कभी 80 तक जीने का सोचा है?” मैं हँसकर बस इतना कह सका, “अब सोचना पड़ेगा।”


91 वर्षीय छात्र और डॉक्टर सुज़ुकी

अगली मुलाक़ात डॉ. मकोतो सुज़ुकी से हुई, जो 91 की उम्र में भी रोज़ कार ड्राइव करते हैं, नए अंग्रेज़ी शब्द सीखते हैं और अब भी क्लिनिक चलाते हैं। 1975 से वे Okinawa Centenarian Study पर काम कर रहे हैं—दुनिया भर के वैज्ञानिक उनसे सलाह लेने आते हैं।

उन्होंने मुझे लंबी आयु के तीन सूत्र बताए:

  1. ननकुरुनाइसा – तनाव को हवा की तरह बहने दो।

  2. मोआई – अपने जैसे पाँच‑दस दोस्तों का समूह बनाओ; हर हफ़्ते मिलो, दुख‑सुख बाटो।

  3. इकिगाई – रोज़ सुबह उठने का एक गहरा मक़सद तय करो—बागवानी, संगीत, पढ़ाई कुछ भी।

डॉ. सुज़ुकी शाम को समुद्र किनारे धीरे‑धीरे टहलते हैं। “धीमी चाल लंबी चाल है,” वे मुस्कुरा कर बोले।


स्वाद, लेकिन सीमित मात्रा में

ओकिनावा का पारम्परिक खाना दिखने में रंग‑बिरंगा है—शकरकंद से लेकर कड़वे करेले तक, सोया‑टॉफ़ू से समुद्री शैवाल तक। दिन भर में ये लोग 15‑18 अलग‑अलग प्राकृतिक चीज़ें खाते हैं, पर कुल कैलोरी 1800 से ज़्यादा नहीं।

सबसे दिलचस्प आदत “हरा हाची बू” है—यानि पेट 80 फीसद भरते ही रुक जाना। प्लेट छोटी, स्वाद बड़ा; शायद इसी संतुलन ने उनकी कोशिकाओं को समय से आगे बढ़ने ही नहीं दिया।


शरीर को ज़मीन से जोड़े रखना

ज़्यादातर घरों में सोफ़ा कम, टाटामी (फ़र्श) ज़्यादा है। उठना‑बैठना अपने आप में रोज़ाना की “स्क्वाट ट्रेनिंग” बन जाता है। खेतों में काम, घर में बागवानी, या पास के समुद्र में तैराकी—यहाँ कसरत को अलग से “शेड्यूल” नहीं किया जाता; वह जीवन में बुनी होती है।


सामुदायिक धागा: ‘यूइमारू’

शाम ढले गाँव में मैंने देखा—बुज़ुर्ग, बच्चे और जवान एक ही चौक पर इकठ्ठा होकर ताईको ड्रम बजा रहे थे। इसे ‘यूइमारू’ कहते हैं—पड़ोसी भाव, आपसी मदद, और सामूहिक उत्सव। वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा सामाजिक तानाबाना तनाव के रसायनों को घोल दे ता है, और यही इम्यून सिस्टम को मज़बूत रखता है।


“ब्लू ज़ोन” से निकली प्रेरणा

ओकिनावा उन पाँच वैश्विक “ब्लू ज़ोन” में से एक है जहाँ शतायु लोग आम हैं—सारदीनिया, निकोया, इकारिया और लोमा लिंडा इसकी ‘भाइयाँ’ हैं। इन सब जगहों में इकिगाई, सामुदायिक सहयोग, वनस्पति‑प्रधान भोजन और सीमित कैलोरी जैसी कड़ियाँ एक जैसी मिलती हैं।


अपने लिए सबक

सफ़र ख़त्म होते‑होते मैंने शीमा‑सान को फिर से देखा; वह टैक्सी पॉलिश कर रही थीं। मुझे देखकर बोलीं, “अगली बार जब मिलें, तुम्हें मोआई का दोस्त बना लूँगी।” मैं मुस्कुरा दिया, मगर मन ही मन तय किया—

  • हर सुबह इकिगाई लिखूँगा,

  • दोस्तों का एक भरोसेमंद मोआई बनाऊँगा,

  • और खाना खाते वक़्त हरा हाची बू याद रखूँगा।

शायद हम सबके भीतर भी एक छोटा‑सा ओकिनावा छुपा है—बस दरवाज़ा खोलने की देर है। तब 100 साल जीना एक सपना नहीं, नया “नॉर्मल” बन सकता है।